राजधानी दिल्ली में 10 अक्टूबर को हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान लुटियंस दिल्ली के बड़े हिस्से में इंटरनेट सेवा बंद करने के फैसले पर केंद्र सरकार बैकफुट पर आ गई है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख के बाद अपनी गलती मानते हुए अदालत से माफी मांग ली है। केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने शीर्ष अदालत में पेश होकर इस फैसले पर खेद जताया और साफ किया कि प्रशासन का मकसद अदालत की अवमानना करना नहीं था। दरअसल उस दिन प्रदर्शन को देखते हुए रायसीना हिल्स के करीब चार किलोमीटर के दायरे में कई घंटों तक मोबाइल इंटरनेट बंद कर दिया गया था, जिससे आम लोगों के साथ-साथ वकीलों और अदालत के कामकाज पर भी सीधा असर पड़ा था।
अदालत की नाराजगी
जैसे ही इंटरनेट बंद होने की खबर फैली, सुप्रीम कोर्ट ने मामले को बेहद गंभीरता से लिया। अदालत ने सीधे तौर पर यह सवाल उठाया कि इतने संवेदनशील इलाके में बिना किसी ठोस आधार और तय नियमों की अनदेखी करते हुए नेट कैसे ठप कर दिया गया। अदालत का मानना था कि इंटरनेट बंद होने से सुप्रीम कोर्ट की डिजिटल रजिस्ट्री और वकीलों की ऑनलाइन फाइलिंग का काम ठप पड़ गया। इसके बाद अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए संबंधित अधिकारियों को अवमानना का नोटिस थमा दिया था। नोटिस मिलते ही गृह मंत्रालय में हलचल मच गई और आनन-फानन में कानूनी सलाह लेकर जवाब तैयार किया गया।
गृह सचिव का पक्ष
अदालत के सामने पेश होते हुए केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने पूरे मामले पर सफाई दी। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था की नाजुक स्थिति को संभालने के लिए स्थानीय अधिकारियों ने यह कदम उठाया था, लेकिन इसे लागू करने में प्रक्रियागत चूक हुई। गृह सचिव ने माना कि इस तरह के आदेश से पहले अदालत के कामकाज और आम जनता की सहूलियत का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए था। उन्होंने शीर्ष अदालत को भरोसा दिलाया कि भविष्य में इस तरह की गलती दोहराई नहीं जाएगी और किसी भी प्रदर्शन या वीआईपी मूवमेंट के नाम पर बिना सोचे-समझे इंटरनेट सेवा नहीं रोकी जाएगी।
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