उत्तर प्रदेश के शैक्षणिक और राजनीतिक गलियारों में इन दिनों विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए दिशा-निर्देशों को लेकर भारी उत्तेजना देखी जा रही है। केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित 'प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026' ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस विवाद में सबसे प्रखर स्वर अयोध्या के तपस्वी छावनी के जगद्गुरु परमहंस आचार्य का उभरकर सामने आया है। उन्होंने सीधे तौर पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित करते हुए एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने यूजीसी के नए मसौदे को भारतीय सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना के विपरीत बताया है। आचार्य का तर्क है कि ये नियम समाज को बांटने वाले हैं और इससे युवाओं के भीतर वैचारिक भ्रम पैदा होगा।

आचार्य की नाराजगी और इच्छामृत्यु की कठोर चेतावनी

जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने अपने पत्र में न केवल नीतिगत आपत्तियां दर्ज कराई हैं, बल्कि एक भावुक और कठोर मांग भी रखी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि इन विवादित नियमों को तत्काल प्रभाव से वापस नहीं लिया गया, तो उन्हें इच्छामृत्यु की अनुमति प्रदान की जाए। उनका आरोप है कि शिक्षा व्यवस्था में किए जा रहे ये बदलाव राष्ट्र के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देंगे। आचार्य के अनुसार, यह कदम उन्होंने विशुद्ध रूप से राष्ट्रहित में उठाया है और वे इस मुद्दे पर किसी भी प्रकार के समझौते के मूड में नहीं दिख रहे हैं। उनकी इस चेतावनी ने शासन प्रशासन के बीच हड़कंप मचा दिया है क्योंकि अयोध्या से उठने वाली यह आवाज धार्मिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर बड़ा प्रभाव रखती है।

जमीन पर उतरता छात्र आक्रोश और सवर्णों की चिंताएं

उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों जैसे अलीगढ़, संभल और कुशीनगर में छात्र संगठनों का प्रदर्शन उग्र होता जा रहा है। प्रदर्शनकारियों का मुख्य आरोप यह है कि नए नियमों में 'भेदभाव' की जो परिभाषा गढ़ी गई है, वह एकतरफा है। विरोध करने वाले समूहों का मानना है कि इन प्रावधानों के जरिए सामान्य वर्ग के छात्रों को पहले से ही अपराधी के रूप में देखा जा रहा है। उनकी आशंका है कि समता समितियों के गठन और निगरानी टीमों के कामकाज से सवर्ण छात्रों के खिलाफ झूठे मुकदमों और शिकायतों की बाढ़ आ जाएगी। प्रदर्शनकारियों के अनुसार, नियमों में झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ दंड का कोई प्रावधान नहीं होना शैक्षणिक संस्थानों में अराजकता को बढ़ावा देगा।

समता समितियों का गठन और सरकार का आधिकारिक पक्ष

विवाद की जड़ में वह अधिसूचना है जो उच्च शिक्षण संस्थानों में समता समितियों और हेल्पलाइन्स को अनिवार्य बनाती है। सरकार का उद्देश्य इन समितियों के माध्यम से अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी, दिव्यांगों और महिलाओं के हितों की रक्षा करना है। आधिकारिक पक्ष का कहना है कि उच्च शिक्षा में निष्पक्षता लाने के लिए यह अनिवार्य है कि निर्णय लेने वाली समितियों में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व हो। हालांकि, विरोध कर रहे पक्ष का कहना है कि इन समितियों में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व को लेकर स्पष्टता का अभाव है, जिससे एक विशेष वर्ग के भीतर असुरक्षा की भावना पनप रही है। फिलहाल, प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं आई है, लेकिन आंदोलन की तपिश लगातार बढ़ती जा रही है।


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