राजधानी दिल्ली के लुटियंस क्षेत्र में राजनीतिक तापमान उस समय बढ़ गया जब विपक्षी दलों के 'इंडिया' गठबंधन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के ख़िलाफ़ एक विशाल विरोध मार्च निकाला। बाराखंबा रोड से सुप्रीम कोर्ट तक प्रस्तावित इस पैदल मार्च में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, प्रियंका गांधी वाड्रा, राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की सांसद सुप्रिया सुले समेत विपक्ष के तमाम बड़े नेता शामिल हुए। यह प्रदर्शन केवल सड़क पर नारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दिल्ली पुलिस की बहुस्तरीय बैरिकेडिंग, मंडी हाउस पर तीखे गतिरोध और बाद में नेताओं के सुप्रीम कोर्ट परिसर पहुंचने के साथ एक बड़े राजनीतिक और कानूनी घटनाक्रम में बदल गया। पुलिस के कड़े सुरक्षा घेरे के बीच शाम ढलते विपक्षी नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल सुप्रीम कोर्ट के गेट बी पर पहुंचा और चुनाव आयोग की भूमिका तथा मतदाता सूचियों से जुड़ी विसंगतियों को लेकर शीर्ष अदालत में एक औपचारिक याचिका दाखिल की।

कनॉट प्लेस से सटे बाराखंबा रोड पर विपक्षी दलों के हज़ारों कार्यकर्ता और नेता जुटने लगे थे। हाथों में तिरंगा, लोकतांत्रिक अधिकारों के समर्थन में लिखे बैनर और चुनाव आयोग की कथित पक्षपातपूर्ण कार्यप्रणाली के ख़िलाफ़ तख्तियां लिए कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे। इस प्रदर्शन में राजनीतिक दलों के अलावा वामपंथी छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नेहा बोरा के नेतृत्व में छात्र-युवा समूहों ने भी बड़ी भागीदारी दर्ज कराई। विपक्ष की योजना बाराखंबा से मंडी हाउस और भगवान दास मार्ग होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक शांतिपूर्ण मार्च निकालने की थी। हालांकि, दिल्ली पुलिस ने संसद सत्र और लुटियंस ज़ोन की सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देते हुए इस मार्च को पूर्व अनुमति नहीं दी थी। पूरे मार्ग पर दिल्ली पुलिस के साथ-साथ त्वरित कार्य बल और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवानों को तैनात किया गया था।

जैसे ही प्रदर्शनकारियों का काफिला मंडी हाउस गोलचक्कर की तरफ बढ़ा, भारी पुलिस बल ने लोहे के कई स्तरों वाले बैरिकेड लगाकर रास्ता पूरी तरह बंद कर दिया। पुलिस अधिकारियों का कहना था कि यह क्षेत्र निषेधाज्ञा के तहत आता है और यहां किसी भी प्रकार के अनधिकृत जुलूस या भीड़ जुटाने की अनुमति नहीं है। जब प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स हटाकर आगे बढ़ने की कोशिश की, तो सुरक्षाकर्मियों और नेताओं के बीच तीखी नोकझोंक और धक्का-मुक्की शुरू हो गई। रास्ता रुकने के बाद राहुल गांधी, अखिलेश यादव, मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य वरिष्ठ नेता कार्यकर्ताओं के साथ वहीं सड़क पर बैठ गए और सांकेतिक धरना शुरू कर दिया। नेताओं का कहना था कि किसी संवैधानिक संस्था की कथित कमियों को लेकर अदालत तक जाना और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराना नागरिकों और जन प्रतिनिधियों का मौलिक अधिकार है।

सड़क पर चले इस धरने के बाद नेताओं ने अपने मार्ग में बदलाव किया। काफिले के कुछ वाहन और कार्यकर्ता भगवान दास मार्ग से होते हुए सुप्रीम कोर्ट की तरफ मुड़े, लेकिन वहां भी पुलिस ने पहले से भारी नाकेबंदी कर रखी थी। वहां भी कार्यकर्ताओं और सुरक्षा बलों के बीच तीखा गतिरोध देखा गया। कांग्रेस और सहयोगी दलों के नेताओं ने आरोप लगाया कि सुरक्षा बलों ने उन्हें इंडिया गेट सर्कल और तिलक मार्ग के आसपास ठहरने तक नहीं दिया और लगातार उनके वाहनों को आगे बढ़ाते रहे। काफी देर तक ऐसा प्रतीत हुआ कि सुरक्षा घेरे के कारण यह मार्च अदालत तक पहुंचे बिना ही समाप्त हो जाएगा।

दिनभर चली धक्का-मुक्की और कई दौर के अवरोधों के बावजूद शाम के समय स्थिति ने अप्रत्याशित मोड़ लिया। जहां पुलिस का मुख्य ध्यान मंडी हाउस और भगवान दास मार्ग पर भीड़ को नियंत्रित करने में लगा हुआ था, वहीं राहुल गांधी और प्रमुख विपक्षी नेताओं का काफिला दूसरे रास्ते से होते हुए तिलक मार्ग पहुंचा और सीधे सुप्रीम कोर्ट के गेट बी तक पहुंच गया। अदालत परिसर के गेट पर विपक्षी नेताओं की अचानक उपस्थिति ने सुरक्षा एजेंसियों को भी सतर्क कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के द्वार पर राहुल गांधी के साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, प्रियंका गांधी वाड्रा, संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, सपा प्रमुख अखिलेश यादव, सुप्रिया सुले और तेजस्वी यादव मौजूद थे। नेताओं ने जानकारी दी कि उन्होंने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची में विसंगतियों और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक गारंटी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में विधिवत याचिका दाखिल की है। याचिका सौंपने की प्रक्रिया पूरी करने के बाद सभी नेता वहां से शांतिपूर्वक रवाना हो गए।

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि यह किसी एक दल का मामला नहीं है, बल्कि देश के लोकतंत्र और संविधान की रक्षा का सवाल है। उनका आरोप था कि सत्ताधारी दल संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को प्रभावित करके सत्ता में बने रहना चाहता है। उन्होंने यह भी कहा कि कई क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने और नए नाम जोड़े जाने की विसंगतियां सामने आई हैं, जिस पर आयोग उचित कदम नहीं उठा रहा। अखिलेश यादव ने स्पष्ट किया कि विरोध के स्थान सीमित कर देने या प्रदर्शनकारियों को रोक देने से असल समस्याएं ख़त्म नहीं हो जातीं, और लोकतंत्र में असहमति की आवाज़ को पर्याप्त जगह मिलनी चाहिए।

विपक्ष के इस प्रदर्शन और सुप्रीम कोर्ट जाने के कदम पर भारतीय जनता पार्टी ने तुरंत प्रेस वार्ता कर कड़ी प्रतिक्रिया दी। पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता अनुराग ठाकुर ने विपक्ष पर तीखा राजनीतिक हमला बोलते हुए कहा कि जब जनता विपक्षी दलों को चुनाव में नकार देती है, तो वे नतीजों को स्वीकार करने के बजाय संस्थाओं पर सवाल खड़े करने लगते हैं। उन्होंने कहा कि देश के प्रत्येक नागरिक की तरह विपक्ष को भी अपनी बात अदालत में रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन सड़कों पर इस तरह का माहौल बनाना और खुद को नियम-कानून से ऊपर समझना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुरूप नहीं है। भाजपा नेता ने यह भी आरोप लगाया कि विपक्षी दल खुद को एक प्रकार की संविधानेत्तर संस्था समझने की भूल कर रहे हैं और हार का सामना करते ही संस्थाओं की साख पर प्रश्नचिह्न लगाना उनकी राजनीतिक हताशा को दर्शाता है।

विपक्षी दलों और चुनाव आयोग के बीच लंबे समय से जारी मतभेद इस प्रदर्शन की मुख्य वजह रहे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले आयोग पर विपक्षी दलों के मुख्य आरोप मतदाता सूचियों की पारदर्शिता, आदर्श आचार संहिता के क्रियान्वयन में कथित पक्षपात और मतदान के अंतिम आंकड़ों के प्रकाशन में देरी से जुड़े रहे हैं। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि आयोग को कई बार ज्ञापन सौंपे जाने के बाद भी जब संतोषजनक समाधान नहीं निकला, तब उन्हें सड़क पर उतरकर शीर्ष अदालत का रुख करना पड़ा।

सोमवार को राजधानी में घटे इस घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनावी सुधारों और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली का मुद्दा अब संसद और बयानों से आगे बढ़कर सड़क और अदालत दोनों जगह पहुंच चुका है। एक ही दिन में सड़क पर जनबल की उपस्थिति और उसी शाम शीर्ष अदालत में विधिक कदम उठाना यह संकेत देता है कि विपक्ष इस विषय को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में बनाए रखने के मूड में है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सुप्रीम कोर्ट में विपक्ष की इस याचिका पर कब सुनवाई होती है और अदालत चुनाव आयोग से जुड़े इन सवालों पर क्या रुख अपनाती है, जबकि सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच इस विषय को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी आने वाले दिनों में और तेज होने के आसार हैं।
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